राधे जू रंग भीनी राजकुँवारि।
अलख लड़ैती लाज गहेली, अलबेली सुकुमारि॥ [1]
चंपक-बरनी पिय-मन-हरनी, अँग-अँग साजि सिँगारि।
करत केलि संकेत-सदन मैं, सँग बंसी सहचारि॥ [2]
आए मनमोहन सोहन छबि, इकटक रहे निहारि।
मृदु मुसकानि बंक चितवनि लखि, सके न तनहि सँभारि॥ [3]
परम दयाल किसोरी गोरी, गहि लीने उर धारि।
प्रीति दुहुन की निरखि अलिन तहाँ, तन-मन डारे वारि॥ [4]
- श्री किशोरी अलि
श्री राधा रानी के अनुपम सौंदर्य और प्रिया-प्रियतम के निकुंज-मिलन का गान करते हुए किशोरी अलि कहते हैं—
हमारी स्वामिनी श्रीराधे जू प्रेम-रस के रंग में सराबोर नित्य किशोरी राजकुमारी हैं। वे अलौकिक लाड़िली, परम लजीली, अनुपम अलबेली और सदा सुकुमार हैं। [1]
चम्पे के पुष्प के समान दमकते हुए स्वर्ण वर्ण वाली तथा अपने प्रियतम के मन का हरण करने वाली श्री राधा अपने अंग-अंग में दिव्य आभूषण और श्रृंगार सजाकर, अपनी अनन्य सहचरी बंसी अलि के साथ निकुंज में दिव्य केलि परायण रहती हैं। [2]
जब परम सुंदर छवि वाले मनमोहन श्री कृष्ण पधारते हैं, तब वे प्रिया जी के इस अगाध रूप को विस्मित होकर एकटक निहारते रहते हैं। किशोरी जी की वह अत्यंत कोमल मधुर मुस्कान और कटीली तिरछी चितवन (बंक चितवनि) को देखते ही श्यामसुंदर भावावेश में आकर, अपने शरीर की सुध-बुध खो देते हैं। [3]
तब परम दयालु गोरी किशोरी (श्री राधा) आगे बढ़कर अपने प्रियतम को थाम लेती हैं और अपने हृदय से लगा लेती हैं। उन दोनों के इस अलौकिक और घनीभूत प्रेम-रस को निहारकर वहाँ उपस्थित सहचरियाँ (अलि) आनंद में डूब जाती हैं एवं युगल पर अपना तन, मन, सर्वस्व न्योछावर कर देती हैं। [4]
अलख लड़ैती लाज गहेली, अलबेली सुकुमारि॥ [1]
चंपक-बरनी पिय-मन-हरनी, अँग-अँग साजि सिँगारि।
करत केलि संकेत-सदन मैं, सँग बंसी सहचारि॥ [2]
आए मनमोहन सोहन छबि, इकटक रहे निहारि।
मृदु मुसकानि बंक चितवनि लखि, सके न तनहि सँभारि॥ [3]
परम दयाल किसोरी गोरी, गहि लीने उर धारि।
प्रीति दुहुन की निरखि अलिन तहाँ, तन-मन डारे वारि॥ [4]
- श्री किशोरी अलि
श्री राधा रानी के अनुपम सौंदर्य और प्रिया-प्रियतम के निकुंज-मिलन का गान करते हुए किशोरी अलि कहते हैं—
हमारी स्वामिनी श्रीराधे जू प्रेम-रस के रंग में सराबोर नित्य किशोरी राजकुमारी हैं। वे अलौकिक लाड़िली, परम लजीली, अनुपम अलबेली और सदा सुकुमार हैं। [1]
चम्पे के पुष्प के समान दमकते हुए स्वर्ण वर्ण वाली तथा अपने प्रियतम के मन का हरण करने वाली श्री राधा अपने अंग-अंग में दिव्य आभूषण और श्रृंगार सजाकर, अपनी अनन्य सहचरी बंसी अलि के साथ निकुंज में दिव्य केलि परायण रहती हैं। [2]
जब परम सुंदर छवि वाले मनमोहन श्री कृष्ण पधारते हैं, तब वे प्रिया जी के इस अगाध रूप को विस्मित होकर एकटक निहारते रहते हैं। किशोरी जी की वह अत्यंत कोमल मधुर मुस्कान और कटीली तिरछी चितवन (बंक चितवनि) को देखते ही श्यामसुंदर भावावेश में आकर, अपने शरीर की सुध-बुध खो देते हैं। [3]
तब परम दयालु गोरी किशोरी (श्री राधा) आगे बढ़कर अपने प्रियतम को थाम लेती हैं और अपने हृदय से लगा लेती हैं। उन दोनों के इस अलौकिक और घनीभूत प्रेम-रस को निहारकर वहाँ उपस्थित सहचरियाँ (अलि) आनंद में डूब जाती हैं एवं युगल पर अपना तन, मन, सर्वस्व न्योछावर कर देती हैं। [4]

