मृगनैनी नार नवल रसिया।
जाके बडे बडे नैन में कजरा सोहे, जाकी टेढी सी नजर मेरे मन बसिया॥ [1]
जाके नवरंगी तो लहंगा सोहिये, जाकि पतरी कमर मेरे मन बसिया।
पुरुषोत्तम प्रभु की छभि निरखत, सबे मिली ब्रज में बसिया॥ [2]
- श्री पुरुषोत्तम जी
मृग के समान सुंदर नेत्रों वाली किशोरीजी (श्री राधा) अपने नवल रसिया (श्री कृष्ण) के संग सुशोभित हैं। उनके बड़े-बड़े नेत्रों में लगा हुआ काजल और उनकी वह तिरछी चितवन मेरे मन में बस गई है। [1]
उनके अंगों पर नौ रंगों का दिव्य लहंगा सुशोभित है और उनकी पतली कमर मेरे हृदय को आकर्षित करती है। पुरुषोत्तम जी कहते हैं कि युगल सरकार की इस अनुपम छवि को निहारकर सभी सखियाँ मिलकर सदा के लिए ब्रज में ही बस गई हैं। [2]
जाके बडे बडे नैन में कजरा सोहे, जाकी टेढी सी नजर मेरे मन बसिया॥ [1]
जाके नवरंगी तो लहंगा सोहिये, जाकि पतरी कमर मेरे मन बसिया।
पुरुषोत्तम प्रभु की छभि निरखत, सबे मिली ब्रज में बसिया॥ [2]
- श्री पुरुषोत्तम जी
मृग के समान सुंदर नेत्रों वाली किशोरीजी (श्री राधा) अपने नवल रसिया (श्री कृष्ण) के संग सुशोभित हैं। उनके बड़े-बड़े नेत्रों में लगा हुआ काजल और उनकी वह तिरछी चितवन मेरे मन में बस गई है। [1]
उनके अंगों पर नौ रंगों का दिव्य लहंगा सुशोभित है और उनकी पतली कमर मेरे हृदय को आकर्षित करती है। पुरुषोत्तम जी कहते हैं कि युगल सरकार की इस अनुपम छवि को निहारकर सभी सखियाँ मिलकर सदा के लिए ब्रज में ही बस गई हैं। [2]

