मोकौ लै एकान्त में, मिलि मिलि रसिक विशाल।
कबै सुरत नवकुंज की, कहि हैं बात रसाल॥
- श्री नागरीदास जी, श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (06)
श्री नागरीदास कहते हैं कि उन्हें संसार की कोलाहलपूर्ण वृत्तियों से दूर, ब्रज के किसी गोपनीय एकान्त कुंज में ऐसे अनुभवी रसिक संतों का प्रेमपूर्वक संग कब प्राप्त होगा, जो श्री युगल सरकार की नित्य निकुञ्ज-लीलाओं का मधुर रसास्वादन करते हैं, तथा जिनके संग बैठकर नव-निकुञ्जों की गोपनीय एवं रसपूर्ण लीलाओं का श्रवण करने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त होगा?
कबै सुरत नवकुंज की, कहि हैं बात रसाल॥
- श्री नागरीदास जी, श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (06)
श्री नागरीदास कहते हैं कि उन्हें संसार की कोलाहलपूर्ण वृत्तियों से दूर, ब्रज के किसी गोपनीय एकान्त कुंज में ऐसे अनुभवी रसिक संतों का प्रेमपूर्वक संग कब प्राप्त होगा, जो श्री युगल सरकार की नित्य निकुञ्ज-लीलाओं का मधुर रसास्वादन करते हैं, तथा जिनके संग बैठकर नव-निकुञ्जों की गोपनीय एवं रसपूर्ण लीलाओं का श्रवण करने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त होगा?

