वृन्दावन की रति विनोद कुंज-कुंजन - श्री कारे ख़ान जी

वृन्दावन की रति विनोद कुंज-कुंजन - श्री कारे ख़ान जी

(कवित्त)
वृन्दावन की रति विनोद कुंज-कुंजन में,
आनँद के कंद लाल मूरति गुपाल की। [1]
कालीदह "कारे" पताल पैठि नाग नाथ्यौ,
केतकी के फूल तोरि लाये माला हार की॥ [2]
परसतहिं पूतना परम गति पाय गई,
पलकहिं पार पारयो अजामील नारकी। [3]
गीध गुन-गानहार, छाँछ के उगानहार,
आई ना अहीर! क्या हमारी बार, बार की॥ [4]

- श्री कारे ख़ान जी

श्री वृन्दावन के रसमय कुंज‑कुंजों में नित्य प्रेम‑विलास करने वाले, आनंद के मूल, श्री गोपाल जी की मूर्ति परम मनोहर है। [1]

जिन्होंने कालियदह के भयानक जल से होते हुए पाताल लोक तक प्रवेश किया, उस भयंकर कालिय नाग का मर्दन किया और नीचे से केतकी के अलौकिक फूल तोड़कर उसकी सुंदर जयमाला बना ली। [2]

जिनके मात्र स्पर्श से ही पूतना जैसी राक्षसी को भी परम गति प्राप्त हो गई, और जिनके नाम के प्रभाव से अजामिल जैसे महापापी का भी एक क्षण में उद्धार हो गया। [3]

जिन्होंने गीध (जटायु) जैसे पक्षी का सम्मान किया और ब्रज गोपियों के हाथों में छछिया भर छाछ के लिए तरह‑तरह के नाच नाचते हैं। श्री कारे खाँ जी कहते हैं, “हे अहीर (गोपाल)! क्या आपकी वह कृपालुता हमारे उद्धार के बार (हमारे समय) पर आकर रुक गई है, जो आप अब तक नहीं आए?”। [4]