बृजे सख्य रसा विष्ठा सख्या - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (45, 46)

बृजे सख्य रसा विष्ठा सख्या - श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (45, 46)

बृजे सख्य रसा विष्ठा सख्या श्रीललितादयः। त्रुय्यर्घ दुःसहं यासां बिना राधा पदाम्बुजम्।
राधिका स्वपति मत्वा धार्य ते बालयादिकम्। नासिका भरण, भरणं चापि सौभाग्यं राधिकाश्रयम्॥

- श्री वंशीअलि, श्री राधासिद्धांत (45, 46)

ब्रज में सख्य रस में निमग्न श्री ललितादिक सखियाँ हैं जो श्री राधा के चरण-कमलों के बिना आधे पल का भी वियोग सहन नहीं कर सकतीं। वे श्री राधिका को ही अपना पति मानती हैं और सदा उन्हीं के आश्रय में रहकर नथ, कड़े, चूड़ियाँ, झलका आदि सौभाग्य-चिह्न धारण करती हैं।