जो रस बरस रह्यो बरसाने - ब्रज के लोक गीत

जो रस बरस रह्यो बरसाने - ब्रज के लोक गीत

जो रस बरस रह्यो बरसाने, सो रस तीन लोक में नाहिं।
तीन लोक में नाहिं, वो रस ठाकुर बैकुन्ठहू में नाहिं॥ [1]॥ जो रस...॥
सँकरी गली बनी पर्वत की, दधि लै चली कुमरि कीरति की।
आगे गाय चरैं गिरधर की, दीन्हें सखा सिखाय॥ [2]॥ जो रस...॥
दै जा दान कुँवरि मोहन कौं, तब छाँड़ौ तेरे गोहन कौं।
राज यहाँ बन में गिरधर कौ, दान लेईंगे धाय॥ [3]॥ जो रस...॥
इनके संग सखी मदमाती, उनके संग सखा उत्पाती।
घेरि लई ग्वालिन रसमाती, मन में अति हरषाय॥ [4]॥ जो रस...॥
सुर तैंतीसन की मति बौरी, भजिकें चले बिरज की ओरी।
देखि-देखि या ब्रज की खोरी, ब्रह्मादिक ललचाय॥ [5]॥ जो रस...॥

- ब्रज के लोक गीत

बरसाने में जो मधुर प्रेम-रस बरस रहा है, वैसा रस तीनों लोकों में कहीं नहीं है। इतना ही नहीं, वह रस तो स्वयं वैकुण्ठ में भी दुर्लभ है। [1]

बरसाने के पर्वतीय मार्गों की साँकरी गलि से कीर्तिनंदिनी श्री राधा दधि लेकर चलती हैं। सामने श्री गिरधर अपनी गौएँ चराते हुए आते हैं और वे अपने सखाओं के साथ दान-लीला की योजना बनाते हैं। [2]

वे श्री राधा से कहते हैं— “हे कुँवरि! पहले मोहन को दान दो, तभी हम तुम्हें और तुम्हारी सखियों को आगे जाने देंगे। वे कहते हैं कि इस वन में गिरधर का राज्य है, इसलिए यहाँ दान देना ही होगा।” [3]

उधर श्री राधा की सखियाँ प्रेम और आनन्द में मतवाली हैं, और इधर श्रीकृष्ण के सखा चंचल और उत्पाती बने रहते हैं। वे रस में डूबी हुई ग्वालिनों को घेर लेते हैं और इस विनोदपूर्ण लीला से सबके हृदय में अत्यन्त हर्ष उत्पन्न होता है। [4]

इस ब्रज-रस की महिमा देखकर तैंतीस करोड़ देवताओं की बुद्धि भी मोहित हो जाती है और वे भी ब्रज की ओर दौड़े चले आते हैं। बरसाना की सांखरी खोर और लीलास्थलों को देखकर ब्रह्मा आदि भी उन्हें प्राप्त करने की लालसा करने लगते हैं। [5]