जो कराय सो कीजिये, जो भुगाय सो भोग।
जहां राखे रहिये तहां, यही दास को जोग॥
- श्री सरस माधुरी
भगवान के वास्तविक भक्त के लक्षण बताते हुए सरस माधुरी कहते हैं कि प्रभु उससे जो कराते हैं, वह उसी में अपनी प्रसन्नता मानता है। वे जो सुख-दुःख अथवा जीवन की परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं, उन्हें वह प्रभु का प्रसाद समझकर सहर्ष स्वीकार करता है। प्रभु उसे जहाँ रखते हैं, वह वहीं संतोषपूर्वक रहता है। यही एक सच्चे दास का धर्म एवं सर्वोत्तम साधन है।
जहां राखे रहिये तहां, यही दास को जोग॥
- श्री सरस माधुरी
भगवान के वास्तविक भक्त के लक्षण बताते हुए सरस माधुरी कहते हैं कि प्रभु उससे जो कराते हैं, वह उसी में अपनी प्रसन्नता मानता है। वे जो सुख-दुःख अथवा जीवन की परिस्थितियाँ प्रदान करते हैं, उन्हें वह प्रभु का प्रसाद समझकर सहर्ष स्वीकार करता है। प्रभु उसे जहाँ रखते हैं, वह वहीं संतोषपूर्वक रहता है। यही एक सच्चे दास का धर्म एवं सर्वोत्तम साधन है।

