(सवैया)
शेष महेश दिनेश गणेश लौं, पावत पार न वेद बिचारे। [1]
रिद्धि औ सिद्धि समाधि सभी, मति ताको अनन्त स्वरूप निहारे॥ [2]
कुंज निकुंज कृपालु रसज्ञ जू, काजरि कामरि सीस उढ़ारे। [3]
रेणु रमैया रमापति 'प्रेम', श्री बाँकेबिहारी के डोड़िया द्वारे॥ [4]
- श्री प्रेम जी
शेष, शिव, सूर्य, गणेश तथा स्वयं वेद भी विचार करते-करते उस परम तत्त्व की पूर्ण सीमा नहीं पा सके। [1]
रिद्धियाँ, सिद्धियाँ और समाधिस्थ महापुरुष भी अपनी बुद्धि से उसके अनन्त स्वरूप का पार नहीं पा सकते। [2]
वही कृपालु और रस के परम ज्ञाता श्री बाँकेबिहारी, पर काली कमली ओढ़े हुए, वृन्दावन के कुंजों-निकुञ्जों में विहार करते हैं। [3]
श्री प्रेम जी कहते हैं कि स्वयं ऐश्वर्य-पति भगवान विष्णु भी, प्रेम के इस विशुद्ध स्वरूप श्री बाँकेबिहारी जी की चौखट के द्वार पर, उनकी अलौकिक चरण-रज की रज-कणिका प्राप्त करने की लालसा में निरंतर खड़े दिखाई देते हैं। [4]
शेष महेश दिनेश गणेश लौं, पावत पार न वेद बिचारे। [1]
रिद्धि औ सिद्धि समाधि सभी, मति ताको अनन्त स्वरूप निहारे॥ [2]
कुंज निकुंज कृपालु रसज्ञ जू, काजरि कामरि सीस उढ़ारे। [3]
रेणु रमैया रमापति 'प्रेम', श्री बाँकेबिहारी के डोड़िया द्वारे॥ [4]
- श्री प्रेम जी
शेष, शिव, सूर्य, गणेश तथा स्वयं वेद भी विचार करते-करते उस परम तत्त्व की पूर्ण सीमा नहीं पा सके। [1]
रिद्धियाँ, सिद्धियाँ और समाधिस्थ महापुरुष भी अपनी बुद्धि से उसके अनन्त स्वरूप का पार नहीं पा सकते। [2]
वही कृपालु और रस के परम ज्ञाता श्री बाँकेबिहारी, पर काली कमली ओढ़े हुए, वृन्दावन के कुंजों-निकुञ्जों में विहार करते हैं। [3]
श्री प्रेम जी कहते हैं कि स्वयं ऐश्वर्य-पति भगवान विष्णु भी, प्रेम के इस विशुद्ध स्वरूप श्री बाँकेबिहारी जी की चौखट के द्वार पर, उनकी अलौकिक चरण-रज की रज-कणिका प्राप्त करने की लालसा में निरंतर खड़े दिखाई देते हैं। [4]

