आय निकस ठाड़े भये, थकित रहे छवि देखि।
मनहुँ ठगे से ठगि रहे, लगे न नैंन निमेषि॥
- श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (282)
जैसे ही वे (प्रिया-प्रियतम) वंशीवट में आकर खड़े हुए, उनकी अद्भुत रूप-माधुरी को देखकर सखियाँ ठगी सी रह गईं; उनके नेत्रों की पलकें झपकना भी भूल गईं, मानो वे किसी सम्मोहन में पूरी तरह ठग ली गई हों।
मनहुँ ठगे से ठगि रहे, लगे न नैंन निमेषि॥
- श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (282)
जैसे ही वे (प्रिया-प्रियतम) वंशीवट में आकर खड़े हुए, उनकी अद्भुत रूप-माधुरी को देखकर सखियाँ ठगी सी रह गईं; उनके नेत्रों की पलकें झपकना भी भूल गईं, मानो वे किसी सम्मोहन में पूरी तरह ठग ली गई हों।

