प्यारी अति रस प्रेम प्रवीन।
सुंदरि अति सुकुंवारि लाडली, लाडति लाड नवीन॥ [1]
दरस परस सुख देत निरन्तर, छिन छिन प्रति मिलि लीन।
श्रीबिहारी बिहारिनी दासि लडावत, विपिन बिहार सुख कीन॥ [2]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (185)
परम रसीली तथा प्रेम की कलाओं में निपुण हमारी श्री प्यारी जू (राधा) अत्यंत सुकोमल और लाडली हैं, जो अपने प्रीतम को नित्य-नवीन लाड लड़ाती हैं। [1]
वे दोनों एक-दूसरे को दर्शन और स्पर्श का निरंतर सुख प्रदान करते हैं और क्षण-क्षण में परस्पर मिलकर एक-दूसरे में लीन हो जाते हैं। श्री बिहारिनि दासी कहती हैं कि मैं ऐसे प्रेमी युगल को सदा एक संग लाड लड़ाती हूँ, जो श्री धाम वृन्दावन की कुंजों में, नित्य विहार रस बरसाते हैं एवं उसका मुझे रसास्वादन करवाते हैं। [2]
सुंदरि अति सुकुंवारि लाडली, लाडति लाड नवीन॥ [1]
दरस परस सुख देत निरन्तर, छिन छिन प्रति मिलि लीन।
श्रीबिहारी बिहारिनी दासि लडावत, विपिन बिहार सुख कीन॥ [2]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जू की वाणी, रस के पद (185)
परम रसीली तथा प्रेम की कलाओं में निपुण हमारी श्री प्यारी जू (राधा) अत्यंत सुकोमल और लाडली हैं, जो अपने प्रीतम को नित्य-नवीन लाड लड़ाती हैं। [1]
वे दोनों एक-दूसरे को दर्शन और स्पर्श का निरंतर सुख प्रदान करते हैं और क्षण-क्षण में परस्पर मिलकर एक-दूसरे में लीन हो जाते हैं। श्री बिहारिनि दासी कहती हैं कि मैं ऐसे प्रेमी युगल को सदा एक संग लाड लड़ाती हूँ, जो श्री धाम वृन्दावन की कुंजों में, नित्य विहार रस बरसाते हैं एवं उसका मुझे रसास्वादन करवाते हैं। [2]

