जब परसे प्यारी-चरन, परम-प्रीति नंदनंद।
छुट्यौ मान हरषी प्रिया, मिट्यो बिरह-दुख-द्वंद॥
- श्री सूरदास, सूर सागर (3446.36)
जब नन्दनन्दन श्रीकृष्ण ने परम प्रेम युक्त अपनी प्यारी श्रीराधा के चरणों में झुक कर उन श्रीचरणों का स्पर्श किया, तब प्रियाजी का मान (रूठना) समाप्त हो गया और वे प्रसन्न हो उठीं, जिससे विरह जनित दुःख और द्वंद्व पूरी तरह मिट गया।
छुट्यौ मान हरषी प्रिया, मिट्यो बिरह-दुख-द्वंद॥
- श्री सूरदास, सूर सागर (3446.36)
जब नन्दनन्दन श्रीकृष्ण ने परम प्रेम युक्त अपनी प्यारी श्रीराधा के चरणों में झुक कर उन श्रीचरणों का स्पर्श किया, तब प्रियाजी का मान (रूठना) समाप्त हो गया और वे प्रसन्न हो उठीं, जिससे विरह जनित दुःख और द्वंद्व पूरी तरह मिट गया।

