(राग विहागरौ)
सनेही एक विहारी-विहारिनि।
एक प्रेम रुचि रचे परस्पर, अद्भुत भाँति निहारिनि॥ [1]
तन सौं तन, मन सौं मन, अरुझ्यौ, अरुझनि वारनि-हारनि।
यह छबि देखत ही 'ध्रुव' चित कौं, भूली देह-सँभारनि॥ [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (99)
इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड में यदि कोई वास्विक प्रेमी है, वास्तविक परम स्नेही है, तो वे केवल श्री धाम वृन्दावन की निकुंजों में नित्य विहार करने वाले दिव्य दंपति, श्री बिहारी-बिहारिनि ही हैं, जो परस्पर एक ही प्रेम और रुचि में अनन्य भाव से रंगे हुए हैं तथा एक-दूसरे को अत्यंत अद्भुत भाव से निहारते हैं। [1]
उनके तन से तन, मन से मन तो मिले ही हुए हैं तथा केश कुन्तल एवं हारावली आदि भी सदा उलझी रहती है। श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि इस रसमय छबि को देखते ही चित्त अपनी देह की सुध-बुध पूर्ण रूप से भूल गया है अर्थात् उन बिहारी-बिहारिन में ही लीन हो गया है। [2]
सनेही एक विहारी-विहारिनि।
एक प्रेम रुचि रचे परस्पर, अद्भुत भाँति निहारिनि॥ [1]
तन सौं तन, मन सौं मन, अरुझ्यौ, अरुझनि वारनि-हारनि।
यह छबि देखत ही 'ध्रुव' चित कौं, भूली देह-सँभारनि॥ [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (99)
इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड में यदि कोई वास्विक प्रेमी है, वास्तविक परम स्नेही है, तो वे केवल श्री धाम वृन्दावन की निकुंजों में नित्य विहार करने वाले दिव्य दंपति, श्री बिहारी-बिहारिनि ही हैं, जो परस्पर एक ही प्रेम और रुचि में अनन्य भाव से रंगे हुए हैं तथा एक-दूसरे को अत्यंत अद्भुत भाव से निहारते हैं। [1]
उनके तन से तन, मन से मन तो मिले ही हुए हैं तथा केश कुन्तल एवं हारावली आदि भी सदा उलझी रहती है। श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि इस रसमय छबि को देखते ही चित्त अपनी देह की सुध-बुध पूर्ण रूप से भूल गया है अर्थात् उन बिहारी-बिहारिन में ही लीन हो गया है। [2]

