नमो कृष्ण जै नित्य विहारी।
जयति जयति निति कुञ्ज केलि नव, विलसत संग राधिका प्यारी॥ [1]
सखी समाज साज सुख निति, नव-उच्छव मगन महारी।
श्रीगोविन्दसरन हिय राजत दल फल, फूल लता द्रुम डारी॥ [2]
- श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (3)
नित्य निकुंज में विहार करने वाले श्री कृष्ण को नमस्कार है। वे अपनी प्राणप्रिया श्री राधा जी के साथ नित्य-नवीन केलि-विलास करते हुए सर्वदा जययुक्त (सुशोभित) हैं। [1]
जहाँ सखियों का समाज विविध श्रृंगार और आनन्दमय उत्सवों में निरन्तर मग्न रहता है।श्री गोविन्दशरण कहते हैं कि मेरे हृदय में उस निकुञ्ज की छवि सदा विराजमान रहती है, जहाँ वृक्षों की डालियाँ, लताएँ, फल और फूल उस दिव्य विहार की शोभा को निरंतर बढ़ाते हैं। [2]
जयति जयति निति कुञ्ज केलि नव, विलसत संग राधिका प्यारी॥ [1]
सखी समाज साज सुख निति, नव-उच्छव मगन महारी।
श्रीगोविन्दसरन हिय राजत दल फल, फूल लता द्रुम डारी॥ [2]
- श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (3)
नित्य निकुंज में विहार करने वाले श्री कृष्ण को नमस्कार है। वे अपनी प्राणप्रिया श्री राधा जी के साथ नित्य-नवीन केलि-विलास करते हुए सर्वदा जययुक्त (सुशोभित) हैं। [1]
जहाँ सखियों का समाज विविध श्रृंगार और आनन्दमय उत्सवों में निरन्तर मग्न रहता है।श्री गोविन्दशरण कहते हैं कि मेरे हृदय में उस निकुञ्ज की छवि सदा विराजमान रहती है, जहाँ वृक्षों की डालियाँ, लताएँ, फल और फूल उस दिव्य विहार की शोभा को निरंतर बढ़ाते हैं। [2]

