(कवित्त)
परयौ हो जगत भव भरयौ अज्ञान सौं विषै-रस-लीन ज्यों मीन सर में।
परयौ हो ताक तहाँ काल बग घ्यान धरि गिनत हो घरी-पल नाम कर में॥ [1]
तोरि करि आस और फाँस कलि-काल की मेट कर मान अति नेह भर में।
लीयौ गहि बाहु विवि काढ़ि अलबेली वर राख्यौ अब आनि वन-कुंज-घरमें॥ [2]
- श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (101)
मैं इस अज्ञान से भरे संसार रूपी सागर में उसी प्रकार विषय-भोगों में डूबा हुआ पड़ा था, जैसे कोई मछली सरोवर के जल में मग्न रहती है और वहाँ काल रूपी बगुला ध्यान लगाकर मुझे अपनी ग्रास बनाने की ताक में बैठा हुआ, प्रत्येक घड़ी और पल की गणना कर रहा था। [1]
परंतु मेरी कृपालु स्वामिनी, श्री अलबेली सरकार (श्री राधा) ने कलिकाल की उस कठिन फाँस और मेरी अन्य सांसारिक आशाओं को तोड़कर, मुझ पर अपना अगाध प्रेम बरसाकर, मेरे मिथ्या अभिमान का नाश कर, मेरे हृदय को अपने प्रेम से भर दिया। मेरी दोनों बाँहें पकड़कर मुझे उस भवसागर से बाहर निकाल लिया और अब लाकर अपने इस परम पावन श्री धाम वृन्दावन के सुखद घर में सदा के लिए वास दे दिया। [2]
परयौ हो जगत भव भरयौ अज्ञान सौं विषै-रस-लीन ज्यों मीन सर में।
परयौ हो ताक तहाँ काल बग घ्यान धरि गिनत हो घरी-पल नाम कर में॥ [1]
तोरि करि आस और फाँस कलि-काल की मेट कर मान अति नेह भर में।
लीयौ गहि बाहु विवि काढ़ि अलबेली वर राख्यौ अब आनि वन-कुंज-घरमें॥ [2]
- श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (101)
मैं इस अज्ञान से भरे संसार रूपी सागर में उसी प्रकार विषय-भोगों में डूबा हुआ पड़ा था, जैसे कोई मछली सरोवर के जल में मग्न रहती है और वहाँ काल रूपी बगुला ध्यान लगाकर मुझे अपनी ग्रास बनाने की ताक में बैठा हुआ, प्रत्येक घड़ी और पल की गणना कर रहा था। [1]
परंतु मेरी कृपालु स्वामिनी, श्री अलबेली सरकार (श्री राधा) ने कलिकाल की उस कठिन फाँस और मेरी अन्य सांसारिक आशाओं को तोड़कर, मुझ पर अपना अगाध प्रेम बरसाकर, मेरे मिथ्या अभिमान का नाश कर, मेरे हृदय को अपने प्रेम से भर दिया। मेरी दोनों बाँहें पकड़कर मुझे उस भवसागर से बाहर निकाल लिया और अब लाकर अपने इस परम पावन श्री धाम वृन्दावन के सुखद घर में सदा के लिए वास दे दिया। [2]

