न तत्पुण्यैर्न तद्दानैर्न - स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्डः (2), मार्गशीर्ष महात्म्य (5), अध्यायः (17), छंद (41)

न तत्पुण्यैर्न तद्दानैर्न - स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्डः (2), मार्गशीर्ष महात्म्य (5), अध्यायः (17), छंद (41)

न तत्पुण्यैर्न तद्दानैर्न तपोभिर्न तु स्तवैः।
न लभ्यं विविधैर्योगैर्लभ्यं मदनुभावतः॥

- स्कन्दपुराण, वैष्णवखण्डः (2), मार्गशीर्ष महात्म्य (5), अध्यायः (17), छंद (41)

भगवान कहते हैं— मेरे परम पावन धाम ब्रज की प्राप्ति न तो पुण्य कर्मों से होती है, न दान से, न तपस्या से और न ही स्तुति-प्रार्थनाओं से। विविध प्रकार के योग-साधनों द्वारा भी इसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह दिव्य धाम केवल मेरी अहैतुकी कृपा और अनुग्रह से ही प्राप्त होता है।