(राग आसावरी)
मुकट की छाँह मनोहर कीन्हैं।
निकस कुंजन सूँ आवत प्यारौ, संग भावती लीन्है॥ [1]
फूलन हार सिंगार फूलन को, खौर चन्दन की दीन्हैं।
अलक झलक कुण्डल श्रवणनि में, श्याम सुन्दर रंग भीन्हैं॥ [2]
नाक बुलाक बजत पग नूपुर, पहिरैं पट तन झीन्हैं।
'सहजोबाई' दासि चरन की, कोटि काम छबि छीन्हें॥ [3]
- श्री सहजो बाई
श्री श्यामसुन्दर अपने सुन्दर मुकुट की छाया से शोभायमान होकर निकुञ्ज से बाहर आ रहे हैं और अपनी प्रियतमा श्री राधा (भावती) को साथ लिए हुए हैं। [1]
उन्होंने गले में फूलों का हार और अंगों पर फूलों का ही श्रृंगार धारण किया हुआ है तथा ललाट पर चंदन का सुंदर लेप सुशोभित है। उनके कानों में कुंडल डोल रहे हैं और मुख पर घुँघराले केशों की सुंदर झलक है, ऐसे नवल लाल श्यामसुंदर पूर्णतः प्रेम के रंग में भीगे हुए हैं। [2]
उनकी नासिका में बुलाक (आभूषण), चरणों में मधुर ध्वनि करते नूपुर और शरीर पर अति महीन (पतले) वस्त्र शोभायमान हैं। सहजोबाई कहती हैं कि मैं ऐसे श्रीचरणों की दासी हूँ, जिनकी छवि करोड़ों कामदेवों के सौन्दर्य को भी तिरस्कृत कर देती है। [3]
मुकट की छाँह मनोहर कीन्हैं।
निकस कुंजन सूँ आवत प्यारौ, संग भावती लीन्है॥ [1]
फूलन हार सिंगार फूलन को, खौर चन्दन की दीन्हैं।
अलक झलक कुण्डल श्रवणनि में, श्याम सुन्दर रंग भीन्हैं॥ [2]
नाक बुलाक बजत पग नूपुर, पहिरैं पट तन झीन्हैं।
'सहजोबाई' दासि चरन की, कोटि काम छबि छीन्हें॥ [3]
- श्री सहजो बाई
श्री श्यामसुन्दर अपने सुन्दर मुकुट की छाया से शोभायमान होकर निकुञ्ज से बाहर आ रहे हैं और अपनी प्रियतमा श्री राधा (भावती) को साथ लिए हुए हैं। [1]
उन्होंने गले में फूलों का हार और अंगों पर फूलों का ही श्रृंगार धारण किया हुआ है तथा ललाट पर चंदन का सुंदर लेप सुशोभित है। उनके कानों में कुंडल डोल रहे हैं और मुख पर घुँघराले केशों की सुंदर झलक है, ऐसे नवल लाल श्यामसुंदर पूर्णतः प्रेम के रंग में भीगे हुए हैं। [2]
उनकी नासिका में बुलाक (आभूषण), चरणों में मधुर ध्वनि करते नूपुर और शरीर पर अति महीन (पतले) वस्त्र शोभायमान हैं। सहजोबाई कहती हैं कि मैं ऐसे श्रीचरणों की दासी हूँ, जिनकी छवि करोड़ों कामदेवों के सौन्दर्य को भी तिरस्कृत कर देती है। [3]

