ये दोउ विहरत आनन्द उदित - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (20)

ये दोउ विहरत आनन्द उदित - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (20)

ये दोउ विहरत आनन्द उदित मन, अंग राग अनुराग।
फूली दासि श्रीनागरी, नवल अंग-अंग पराग सुहाग॥

- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, साखी (20)

दोनों श्री युगल (श्यामा-कुंजबिहारी) नित्य विहार कर रहे हैं। उनके मन में अद्भुत आनन्द उदित हो रहा है और उनका परस्पर अनुराग मानो अंगराग के समान उनके अंग-अंग में व्याप्त हो रहा है। इस दिव्य प्रेम-विहार को देखकर श्री नागरीदासी आनन्द से फूली नहीं समा रही और उस नूतन सुहाग-रूपी पराग का प्रभाव उनके अंग-अंग एवं रोम-रोम में भी व्याप्त हो रहा है।