मेरै सरवस धन तुमहिं - श्री रूपरसिक देवाचार्य, रति विलास (02)

मेरै सरवस धन तुमहिं - श्री रूपरसिक देवाचार्य, रति विलास (02)

मेरै सरवस धन तुमहिं, प्रांन-वल्लभा वाल।
तुमहीं रति मति गति तुमहिं, तुमहीं पति प्रतिपाल॥

- श्री रूपरसिक देवाचार्य, रति विलास (02)

हे मेरे प्राणों की वल्लभा, श्री राधे! आप ही मेरा सर्वस्व और एकमात्र धन हैं। आप ही मेरी रति (प्रेम), मेरी बुद्धि, मेरी परम गति, मेरी रक्षक (स्वामिनी) और पालनकर्ती हैं।