(कवित्त)
जय हो सदैव श्री गोविन्ददेव जी की तथा,
जय हो गोपीनाथ ब्रह्मचारी की जय हो। [1]
जय हो राधारमण और राधाबल्लभ की,
जय हो श्रीरंगजी की टिकारी की जय हो॥ [2]
जय हो अष्ट सखी नन्द भवन की जय हो,
जय मदनमोहन मुरारी की जय हो। [3]
जय हो सदा श्रीबंशीवट बिहारी की और,
जय हो सदा श्रीबाँकेविहारी की जय हो॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (1)
श्री गोविन्ददेव जी की सदैव जय हो, और गोपीनाथ ब्रह्मचारी की भी जय हो। [1]
श्री राधारमण और श्री राधावल्लभ की जय हो, तथा श्रीरंगजी टिकारी की भी जय हो। [2]
अष्ट सखियों की जय हो, नन्द भवन की जय हो और मदनमोहन मुरारी की भी जय हो। [3]
श्री बंशीवट बिहारी की सदा जय हो, और श्री बाँकेबिहारी की सदा जय हो। [4]
जय हो सदैव श्री गोविन्ददेव जी की तथा,
जय हो गोपीनाथ ब्रह्मचारी की जय हो। [1]
जय हो राधारमण और राधाबल्लभ की,
जय हो श्रीरंगजी की टिकारी की जय हो॥ [2]
जय हो अष्ट सखी नन्द भवन की जय हो,
जय मदनमोहन मुरारी की जय हो। [3]
जय हो सदा श्रीबंशीवट बिहारी की और,
जय हो सदा श्रीबाँकेविहारी की जय हो॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (1)
श्री गोविन्ददेव जी की सदैव जय हो, और गोपीनाथ ब्रह्मचारी की भी जय हो। [1]
श्री राधारमण और श्री राधावल्लभ की जय हो, तथा श्रीरंगजी टिकारी की भी जय हो। [2]
अष्ट सखियों की जय हो, नन्द भवन की जय हो और मदनमोहन मुरारी की भी जय हो। [3]
श्री बंशीवट बिहारी की सदा जय हो, और श्री बाँकेबिहारी की सदा जय हो। [4]

