राधा पदाब्जसेवान्यस्पृहा - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (8.34)

राधा पदाब्जसेवान्यस्पृहा - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (8.34)

राधा-पदाब्जसेवान्यस्पृहा-कालत्रयोज्झिताम्।
राधा-प्रीतिसुखाम्भोधावपारे बुड़ितां सदा॥

- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (8.34)

भूत, वर्तमान और भविष्य, तीनों कालों में श्रीराधा-दासी को श्रीराधा के चरण-कमलों की सेवा के अतिरिक्त अन्य कोई अभिलाषा नहीं होती। वह श्रीराधा के विशुद्ध प्रेम से प्रकट होने वाले असीम रस-सागर में सदा निमग्न रहती है।