(राग शुद्ध कल्याण - ताल तिताला)
प्रभु के दो ही दास हैं साँचे॥
नेमी होय चाहि हो प्रेमी, होय न मनके काँचे।
प्रथम भक्ति प्रेमी जन पावत, दूजे नेमी राँचे॥ [1]
प्रेम भाव लखि ब्रजगोपिनको, तिनके सँग प्रभु नाँचे।
रूपकुँवरि यह सत्य जान लो, हरि साँचे को साँचे॥ [2]
- श्री रूप कुँवरि जी
इस संसार में प्रभु के केवल दो प्रकार के सच्चे दास (भक्त) होते हैं—एक वे, जो नियमों का दृढ़ता से पालन करने वाले नेमी हैं, और दूसरे वे, जो अनन्य भाव में डूबे हुए प्रेमी हैं। चाहे वे नेमी हों या प्रेमी, एक बात दोनों में समान होती है कि उनका मन कच्चा नहीं होता, अर्थात् उनका विश्वास अटल होता है तथा वे संसार के नश्वर एवं स्वार्थयुक्त स्वभाव को यथार्थ रूप से जानते हैं। सर्वोच्च प्रेम-भक्ति तो प्रेमी जनों को सुलभ होती है और उसके पश्चात् नेमी जनों को। [1]
ब्रज की गोपियों के निष्छल प्रेम-भाव को देखकर ही प्रभु उनके संग रास में नाचे थे। श्री रूपकुँवरि जी कहती हैं कि इस सत्य को भली-भाँति जान लो कि श्री हरि को तुम मूर्ख नहीं बना सकते। वे तो तुम्हारा मन देखते हैं। तुम अपना मन संसार में आसक्त रखो, दूसरों के प्रति राग-द्वेष रखो और स्वयं की भक्ति का प्रदर्शन करो—ऐसी भक्ति से वे प्रसन्न नहीं होते। वे तो सदा सच्चे निष्कपट भक्तों के ही होते हैं। [2]
प्रभु के दो ही दास हैं साँचे॥
नेमी होय चाहि हो प्रेमी, होय न मनके काँचे।
प्रथम भक्ति प्रेमी जन पावत, दूजे नेमी राँचे॥ [1]
प्रेम भाव लखि ब्रजगोपिनको, तिनके सँग प्रभु नाँचे।
रूपकुँवरि यह सत्य जान लो, हरि साँचे को साँचे॥ [2]
- श्री रूप कुँवरि जी
इस संसार में प्रभु के केवल दो प्रकार के सच्चे दास (भक्त) होते हैं—एक वे, जो नियमों का दृढ़ता से पालन करने वाले नेमी हैं, और दूसरे वे, जो अनन्य भाव में डूबे हुए प्रेमी हैं। चाहे वे नेमी हों या प्रेमी, एक बात दोनों में समान होती है कि उनका मन कच्चा नहीं होता, अर्थात् उनका विश्वास अटल होता है तथा वे संसार के नश्वर एवं स्वार्थयुक्त स्वभाव को यथार्थ रूप से जानते हैं। सर्वोच्च प्रेम-भक्ति तो प्रेमी जनों को सुलभ होती है और उसके पश्चात् नेमी जनों को। [1]
ब्रज की गोपियों के निष्छल प्रेम-भाव को देखकर ही प्रभु उनके संग रास में नाचे थे। श्री रूपकुँवरि जी कहती हैं कि इस सत्य को भली-भाँति जान लो कि श्री हरि को तुम मूर्ख नहीं बना सकते। वे तो तुम्हारा मन देखते हैं। तुम अपना मन संसार में आसक्त रखो, दूसरों के प्रति राग-द्वेष रखो और स्वयं की भक्ति का प्रदर्शन करो—ऐसी भक्ति से वे प्रसन्न नहीं होते। वे तो सदा सच्चे निष्कपट भक्तों के ही होते हैं। [2]

