(सवैया)
जप नाम सदा प्रभु वल्लभ को, उनको यश पावन गातो रहै।
रंग जाय सुपुष्टिके रंग अले, उनके शुचिमार्ग पै जातो रहै॥ [1]
नित सेवा करै सब वैष्णव की, श्री यमुना में नित्य नहातो रहै।
बन द्वार को चाकर 'भूप' अहो, इन नित को जूठन पातौ रहै॥ [2]
- श्री रूपचंद जी ‘भूप’
साधक को चाहिए कि वह सदा अपने प्राणप्रिय महाप्रभु श्री वल्लभ का नाम जपता रहे और उन्हीं के परम पावन यश का गान करता रहे। वह पुष्टिमार्ग के अलौकिक भगवद-रस के रंग में पूरी तरह रँग जाए और उनके द्वारा दिखाए गए, इस परम पवित्र मार्ग पर निरंतर चलता रहे। [1]
वह नित्यप्रति सभी वैष्णवों की आदरपूर्वक सेवा करे तथा श्री यमुना जी के पावन जल में नित्य स्नान करे। श्री भूपजी कहते हैं कि वह प्रभु के द्वार का अनन्य चाकर बनकर रहे और नित्य उनके अधरामृत रूपी महाप्रसाद (जूठन) को प्राप्त करता रहे। [2]
जप नाम सदा प्रभु वल्लभ को, उनको यश पावन गातो रहै।
रंग जाय सुपुष्टिके रंग अले, उनके शुचिमार्ग पै जातो रहै॥ [1]
नित सेवा करै सब वैष्णव की, श्री यमुना में नित्य नहातो रहै।
बन द्वार को चाकर 'भूप' अहो, इन नित को जूठन पातौ रहै॥ [2]
- श्री रूपचंद जी ‘भूप’
साधक को चाहिए कि वह सदा अपने प्राणप्रिय महाप्रभु श्री वल्लभ का नाम जपता रहे और उन्हीं के परम पावन यश का गान करता रहे। वह पुष्टिमार्ग के अलौकिक भगवद-रस के रंग में पूरी तरह रँग जाए और उनके द्वारा दिखाए गए, इस परम पवित्र मार्ग पर निरंतर चलता रहे। [1]
वह नित्यप्रति सभी वैष्णवों की आदरपूर्वक सेवा करे तथा श्री यमुना जी के पावन जल में नित्य स्नान करे। श्री भूपजी कहते हैं कि वह प्रभु के द्वार का अनन्य चाकर बनकर रहे और नित्य उनके अधरामृत रूपी महाप्रसाद (जूठन) को प्राप्त करता रहे। [2]

