उमॅगि-उमॅगि आये चहुँदिसि बदरा - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (55)

उमॅगि-उमॅगि आये चहुँदिसि बदरा - श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (55)

उमॅगि-उमॅगि आये चहुँदिसि बदरा, स्याम घटा अनंग-भरे।
तडित चमकत, रूपसुधा भरि, बन सोभा सब हरे-हरे॥ [1]
रंग हिंडोरे झूलत दोऊ, चकित होंइ सखि ठान ठने।
श्रीललितमोहिनी सुख वर्षावत, गावत अति आनंद-भरे॥ [2]

- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (55)

श्रीश्यामसुन्दर की काम-घटा (प्रेमरस-समूह) से भरे बादल चारों ओर से उमड़-उमड़ कर छा रहे हैं। श्रीकिशोरीजी की रूप-सुधा से भरकर बिजली चमक रही है। सुवर्ण-कान्ति-युक्त किशोरी और नीलमणि की आभा वाले किशोर की मिलित शोभा से संपूर्ण वन की शोभा अत्यंत हरी-भरी हो गई है। [1]

प्रिया-प्रियतम प्रेम के झूले पर झूल रहे हैं, गान कर रहे हैं और अतिशय आनन्द की वृष्टि कर रहे हैं। श्री ललितमोहिनी देव जी कहते हैं कि आज श्रीयुगल ने जिस रस-विलास का आयोजन किया है, उसे देखकर सखियाँ अचम्भित रह गई हैं । [2]