(राग सारंग एवं विहागरौ)
राधिका-रवन जय।
नवलकुँवरि वृंदावनवासी, निज दासिन दिखरावत सुख चयः॥ [1]
जाकै चरनकमल सेवत नितु, रसिक अनन्य भये सब निरभय।
ताकै नाम रूप गुन गावत, पावत महाप्रसाद रसालय॥ [2]
नवनिकुंज रति पुंजनि वरषत, परसत अंग ललित लीलामय।
ताकी आस व्यास नहिं छाँड़हि, जद्दपि लोक भये सब निर्दय॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (60)
श्री राधिका-रमण की जय हो! नित्य नवयौवना किशोरी, श्री राधिका महारानी, श्री धाम वृन्दावन में वास करने वाले को अपनी अंतरंगा दासी-भाव प्रदान कर, उसको अथाह रस प्रदान करती हैं। [1]
जिन श्री राधा महारानी जू के चरणकमलों की नित्य सेवा करके रसिक जन अनन्य रसिक बनते हैं तथा सब प्रकार के भयों से पूर्णतः निर्भय हो जाते हैं, उन श्री राधा जू के नाम, रूप और गुणों का गान करने से भक्त प्रेमरूपी महाप्रसाद की प्राप्ति करते हैं, जो समस्त रसों का भण्डार है। [2]
वे युगल सरकार नित्य नवीन निकुञ्जों में प्रेम-रस की वर्षा करते हैं और अपने ललित, प्रेममय स्पर्श से सबको आनन्दित करते हैं। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि चाहे संसार कितना ही निर्दयी क्यों न हो जाए, फिर भी वे श्री राधा की कृपा की आशा कभी नहीं छोड़ते। [3]
राधिका-रवन जय।
नवलकुँवरि वृंदावनवासी, निज दासिन दिखरावत सुख चयः॥ [1]
जाकै चरनकमल सेवत नितु, रसिक अनन्य भये सब निरभय।
ताकै नाम रूप गुन गावत, पावत महाप्रसाद रसालय॥ [2]
नवनिकुंज रति पुंजनि वरषत, परसत अंग ललित लीलामय।
ताकी आस व्यास नहिं छाँड़हि, जद्दपि लोक भये सब निर्दय॥ [3]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (60)
श्री राधिका-रमण की जय हो! नित्य नवयौवना किशोरी, श्री राधिका महारानी, श्री धाम वृन्दावन में वास करने वाले को अपनी अंतरंगा दासी-भाव प्रदान कर, उसको अथाह रस प्रदान करती हैं। [1]
जिन श्री राधा महारानी जू के चरणकमलों की नित्य सेवा करके रसिक जन अनन्य रसिक बनते हैं तथा सब प्रकार के भयों से पूर्णतः निर्भय हो जाते हैं, उन श्री राधा जू के नाम, रूप और गुणों का गान करने से भक्त प्रेमरूपी महाप्रसाद की प्राप्ति करते हैं, जो समस्त रसों का भण्डार है। [2]
वे युगल सरकार नित्य नवीन निकुञ्जों में प्रेम-रस की वर्षा करते हैं और अपने ललित, प्रेममय स्पर्श से सबको आनन्दित करते हैं। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि चाहे संसार कितना ही निर्दयी क्यों न हो जाए, फिर भी वे श्री राधा की कृपा की आशा कभी नहीं छोड़ते। [3]

