सुघर सुजान स्वामिनी मेरी।
गावत गुन निसि-दिन पिय-जिय में, तो सम तिय को हेरी॥ [1]
त्रिभुवन सुन्दर मणि श्रीस्यामा, तुहि देखत कोक डरे री।
पूरन आस करो 'परमानंद, हित' नित राखौ नेरी॥ [2]
- श्री हित परमानंद दास जी, श्री हित परमानंद दास जी की वाणी, पदावली (74)
संपूर्ण सौंदर्य की पराकाष्ठा और समस्त कलाओं की परम ज्ञाता (सुजान) श्री राधा महारानी जू ही मेरी एकमात्र आराध्या स्वामिनी हैं। स्वयं रसिकशेखर श्री श्यामसुंदर जिनके रूप और अगाध गुणों का गान दिन-रात अपने हृदय के भीतर करते रहते हैं, और विस्मित होकर संपूर्ण ब्रह्मांड में ढूँढ़ते हैं हुए कहते हैं कि हे प्यारी! पूरे ब्रह्मांड में तुम्हारे समान कोई दूसरी नारी आज तक कहीं नहीं देखी। [1]
हे त्रिभुवन-सुन्दरी श्री श्यामा! आपकी अनुपम लावण्यमयी छवि को देखकर तो साक्षात् कामदेव भी अपने सौंदर्य से लज्जित होकर सहम जाता है। श्री हित परमानंद जी प्रार्थना करते हैं कि हे किशोरी जी! मेरी इस अनन्य आशा को पूर्ण करो कि मैं सदा आपके श्री चरणों के समीप रहूँ। [2]
गावत गुन निसि-दिन पिय-जिय में, तो सम तिय को हेरी॥ [1]
त्रिभुवन सुन्दर मणि श्रीस्यामा, तुहि देखत कोक डरे री।
पूरन आस करो 'परमानंद, हित' नित राखौ नेरी॥ [2]
- श्री हित परमानंद दास जी, श्री हित परमानंद दास जी की वाणी, पदावली (74)
संपूर्ण सौंदर्य की पराकाष्ठा और समस्त कलाओं की परम ज्ञाता (सुजान) श्री राधा महारानी जू ही मेरी एकमात्र आराध्या स्वामिनी हैं। स्वयं रसिकशेखर श्री श्यामसुंदर जिनके रूप और अगाध गुणों का गान दिन-रात अपने हृदय के भीतर करते रहते हैं, और विस्मित होकर संपूर्ण ब्रह्मांड में ढूँढ़ते हैं हुए कहते हैं कि हे प्यारी! पूरे ब्रह्मांड में तुम्हारे समान कोई दूसरी नारी आज तक कहीं नहीं देखी। [1]
हे त्रिभुवन-सुन्दरी श्री श्यामा! आपकी अनुपम लावण्यमयी छवि को देखकर तो साक्षात् कामदेव भी अपने सौंदर्य से लज्जित होकर सहम जाता है। श्री हित परमानंद जी प्रार्थना करते हैं कि हे किशोरी जी! मेरी इस अनन्य आशा को पूर्ण करो कि मैं सदा आपके श्री चरणों के समीप रहूँ। [2]

