चन्द्रिका की चटक मुकुट की - श्री रसिक गोविंद

चन्द्रिका की चटक मुकुट की - श्री रसिक गोविंद

(कवित्त)
चन्द्रिका की चटक मुकुट की लटक,
नैन भौहनि की मटक झटक उर-दाम की। [1]
कटिकी लचनि औ नचनि नकवेसरि की,
महंदी रचनि सचनि कोटि काम की॥ [2]
हंसनि दशन की लसनि तन भूषन की,
‘श्रीगोविन्द’ रूप गुन जोवनाभिराम की। [3]
दुति की दमक झीन मून की झमक आज,
झूमि झूमि झूलनि झुकनि श्यामा श्याम की॥ [4]

- श्री रसिक गोविंद

आज हिंडोले पर झूलते हुए युगल सरकार की रूप-माधुरी का वर्णन करते हुए श्री रसिक गोविंद कहते है –

श्री राधा जू के मस्तक पर धारण की हुई चन्द्रिका की उज्ज्वल आभा (चटक), श्री कृष्ण के मुकुट का सुंदर ढंग से एक ओर लटकना, और दोनों के चंचल नेत्रों तथा भौंहों की चित्ताकर्षक मटक देखते ही बनती है। झूला झूलते समय उनके हृदय पर सुशोभित पुष्पों की मालाओं का हवा में झटकना परम सुंदर प्रतीत होता है। [1]

झूले की गति के साथ श्री राधा की पतली कमर का मन्द-मन्द लचकना, उनकी नासिका में झिलमिलाती हुई नथनी का हिलना-डुलना, और उनके सुकोमल हाथों में रची हुई मेहंदी की सुंदर बनावट साक्षात् करोड़ों कामदेवों के सौंदर्य का सृजन करने वाली है। [2]

युगल सरकार की वह मन्द-मन्द हँसी, उनके श्वेत दाँतों की दिव्य चमक, और उनके श्री अंगों पर सजे हुए आभूषणों की शोभा, उनके इस परम सुंदर और नूतन यौवन से अभिराम स्वरूप को और अधिक शोभायमान बना रही है। [3]

श्री रसिक गोविन्द जी भाव-विभोर होकर कहते हैं कि उनके दिव्य कांति की चमक और उनके महीन वस्त्रों पर लगे हुए सुनहरे गोटे-किनारी की झमझमाहट के बीच, आज सावन के इस पावन अवसर पर श्री श्यामा-श्याम का आनंद में भरकर झूम-झूमकर झूलना और पीयूष-वर्षा करते हुए परस्पर एक-दूसरे की ओर झुकना, रसिकों के प्राणों को परम सुख प्रदान कर रहा है। [4]