बास बरसाने को मोहि दीजे - श्री सरस माधुरी

बास बरसाने को मोहि दीजे - श्री सरस माधुरी

(राग कालंगडा व खम्माच व विहाग)
बास बरसाने को मोहि दीजे।
सुनहु कुँवरि कीरति कुल मंडन, मोको अपनी कीजे॥ [1]
टहल महल प्यारी बलिहारी, उचित होय सो लीजे।
‘सरसमाधुरी’ रूप राशि छवि, नैनन सों लखि लीजे॥ [2]

- श्री सरस माधुरी

हे किशोरी जी! मुझे अपने परम पावन धाम बरसाने का वास प्रदान कीजिए। हे कीर्ति मैया के कुल को सुशोभित करने वाली नवल कुँवरि श्री राधा! मेरी इस प्रार्थना को सुनिए और दया करके मुझे अपनी निज दासी बना लीजिए। [1]

हे प्यारी जू! मैं आपके महलों की सेवा पर न्योछावर जाती हूँ; आपको जैसा उचित लगे वही सेवा मुझे प्रदान कीजिए। श्री सरस माधुरी कहते हैं कि आपकी इस अनुपम रूप-राशि की दिव्य छवि को मैं निरंतर अपने नेत्रों से निहारती रहूँ, बस यही कृपा कर दीजिए। [2]