बार बार नन्दनंद इत, आतुर जोहतै राह।
प्यारी मुखशशि चंदकी, नैन चकोरन चाह॥
- श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास
श्रीकृष्ण अत्यन्त व्याकुल होकर बार-बार उसी मार्ग की ओर निहार रहे हैं, जहाँ श्री राधा के चरण पड़े हैं। उनके चकोर-रूपी नेत्र अपनी प्रियतमा श्रीराधा के मुखचन्द्र के दर्शन के लिए परम लालायित हैं।
प्यारी मुखशशि चंदकी, नैन चकोरन चाह॥
- श्री ब्रजवासीदास, ब्रज विलास
श्रीकृष्ण अत्यन्त व्याकुल होकर बार-बार उसी मार्ग की ओर निहार रहे हैं, जहाँ श्री राधा के चरण पड़े हैं। उनके चकोर-रूपी नेत्र अपनी प्रियतमा श्रीराधा के मुखचन्द्र के दर्शन के लिए परम लालायित हैं।

