(कवित्त)
मेरी कुल पूजि तुहीं मानी ठकुरानी करि,
तोही नित आंखिन में हिय में धरति हों। [1]
तेरे ई संतोष हेत दछिन रसीले गुन,
मानि मानि आलिन की सीख निद रति हौं॥ [2]
आनि वन्यों जोग अब मैंरे वड़भागिन तें,
ताही ते अधीनता लै दीनता करति हौं। [3]
देखनि दै नेकु प्रान प्रीतम मुखारबिंद
हाहा लाज आजु तेरे पाइन परति हौं॥ [4]
- श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (41)
हे स्वामिनी! मैंने तुम्हें ही अपने कुल की पूज्या और अपनी एकमात्र ठकुरानी (स्वामिनी) माना है। मैं तुम्हें ही नित्य अपनी आँखों में और अपने हृदय में धारण करती हूँ। [1]
तुम्हारे सुख के लिए ही मैं चतुर सखियों के बताए रसीले गुणों और शिक्षाओं को मानती हूँ और उनका अभ्यास करती हूँ। [2]
बड़े सौभाग्य से ही आज यह अवसर बन पाया है, इसीलिए मैं अपने मन की सारी अधीनता छोड़कर पूर्ण दीनता (शरणागति) के साथ तुमसे विनती करती हूँ। [3]
मुझे आपके प्राणप्रियतम श्री कृष्ण के मुखारविन्द के तनिक दर्शन करा दो। हा! मैं आज अपनी सारी लज्जा छोड़कर तुम्हारे चरणों में गिरती हूँ (प्रार्थना करती हूँ)। [4]
मेरी कुल पूजि तुहीं मानी ठकुरानी करि,
तोही नित आंखिन में हिय में धरति हों। [1]
तेरे ई संतोष हेत दछिन रसीले गुन,
मानि मानि आलिन की सीख निद रति हौं॥ [2]
आनि वन्यों जोग अब मैंरे वड़भागिन तें,
ताही ते अधीनता लै दीनता करति हौं। [3]
देखनि दै नेकु प्रान प्रीतम मुखारबिंद
हाहा लाज आजु तेरे पाइन परति हौं॥ [4]
- श्री मनोहर दास, रसिक जीवनी (41)
हे स्वामिनी! मैंने तुम्हें ही अपने कुल की पूज्या और अपनी एकमात्र ठकुरानी (स्वामिनी) माना है। मैं तुम्हें ही नित्य अपनी आँखों में और अपने हृदय में धारण करती हूँ। [1]
तुम्हारे सुख के लिए ही मैं चतुर सखियों के बताए रसीले गुणों और शिक्षाओं को मानती हूँ और उनका अभ्यास करती हूँ। [2]
बड़े सौभाग्य से ही आज यह अवसर बन पाया है, इसीलिए मैं अपने मन की सारी अधीनता छोड़कर पूर्ण दीनता (शरणागति) के साथ तुमसे विनती करती हूँ। [3]
मुझे आपके प्राणप्रियतम श्री कृष्ण के मुखारविन्द के तनिक दर्शन करा दो। हा! मैं आज अपनी सारी लज्जा छोड़कर तुम्हारे चरणों में गिरती हूँ (प्रार्थना करती हूँ)। [4]

