(राग सोरठ)
प्रभु, मैं पीछौ लियौ तुम्हारौ।
तुम तौ दीनदयाल कहावत, सकल आपदा टारौ॥ [1]
महा कुबुद्धि, कुटिल, अपराधी, औगुन भरि लियौ भारौ।
सूर कूर की याही बिनती, लै चरननि मैं डारौ॥ [2]
- श्री सूरदास, सूरसागर (218)
हे प्रभु! मैंने अब आपका पीछा पकड़ लिया है, अर्थात् अब मैं आपकी अनन्य शरण में आ गया हूँ। आप तो दीनों पर दया करने वाले कहे जाते हैं, अतः मेरी समस्त विपत्तियों को टाल दीजिए। [1]
एक तो मैं अत्यन्त दुर्बुद्धि, कुटिल, और अपराधी हूँ, और ऊपर से अपने सिर पर अनेक प्रकार के दुर्गुणों का भारी बोझ लादकर बैठा हूँ। अतः इस दुष्ट सूरदास की यही एकमात्र प्रार्थना है कि कृपा करके मुझे अपने चरणों में डाल रखिये (अपनी शरण में रख लीजिए)। [2]
प्रभु, मैं पीछौ लियौ तुम्हारौ।
तुम तौ दीनदयाल कहावत, सकल आपदा टारौ॥ [1]
महा कुबुद्धि, कुटिल, अपराधी, औगुन भरि लियौ भारौ।
सूर कूर की याही बिनती, लै चरननि मैं डारौ॥ [2]
- श्री सूरदास, सूरसागर (218)
हे प्रभु! मैंने अब आपका पीछा पकड़ लिया है, अर्थात् अब मैं आपकी अनन्य शरण में आ गया हूँ। आप तो दीनों पर दया करने वाले कहे जाते हैं, अतः मेरी समस्त विपत्तियों को टाल दीजिए। [1]
एक तो मैं अत्यन्त दुर्बुद्धि, कुटिल, और अपराधी हूँ, और ऊपर से अपने सिर पर अनेक प्रकार के दुर्गुणों का भारी बोझ लादकर बैठा हूँ। अतः इस दुष्ट सूरदास की यही एकमात्र प्रार्थना है कि कृपा करके मुझे अपने चरणों में डाल रखिये (अपनी शरण में रख लीजिए)। [2]

