(सवैया)
लीने लली ललतादिक संग, उमंग सौं श्री वृषभानुदुलारी।
मालती कुंद निवारी गुलाब सु, फूल रही चहुंधा फुलबारी॥ [1]
हेम के छूटे फुहारे ‘हठी’, मघवा मध मेघ महा सहकारी।
हौज पै चौज सों मौज भरी बलि, बैठी विलोकत राधिकाप्यारी॥ [2]
- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (61)
श्री वृषभानु-दुलारी श्रीराधा अपनी ललिता आदि सखियों के संग अत्यंत उमंग के साथ सुंदर फुलवारी में पधारी हैं जहाँ मालती, कुंद, निवारी तथा गुलाब आदि विविध पुष्पों से सुसज्जित फुलवारी चारों ओर अपनी सुगंध बिखेर रही है। [1]
जहाँ स्वर्णिम फव्वारों से जल की मनोहर धाराएँ फूट रही हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो वहाँ वर्षा-ऋतु का मनोहर वातावरण साकार हो उठा हो। श्री हठी कहते हैं कि मैं उस अद्भुत झाँकी पर बलिहारी जाता हूँ, जहाँ श्री राधिका प्यारी हौज (जलाशय) के समीप अत्यन्त आनन्द और विनोद के साथ बैठकर उस रमणीय दृश्य का अवलोकन कर रही हैं। [2]
लीने लली ललतादिक संग, उमंग सौं श्री वृषभानुदुलारी।
मालती कुंद निवारी गुलाब सु, फूल रही चहुंधा फुलबारी॥ [1]
हेम के छूटे फुहारे ‘हठी’, मघवा मध मेघ महा सहकारी।
हौज पै चौज सों मौज भरी बलि, बैठी विलोकत राधिकाप्यारी॥ [2]
- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (61)
श्री वृषभानु-दुलारी श्रीराधा अपनी ललिता आदि सखियों के संग अत्यंत उमंग के साथ सुंदर फुलवारी में पधारी हैं जहाँ मालती, कुंद, निवारी तथा गुलाब आदि विविध पुष्पों से सुसज्जित फुलवारी चारों ओर अपनी सुगंध बिखेर रही है। [1]
जहाँ स्वर्णिम फव्वारों से जल की मनोहर धाराएँ फूट रही हैं, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो वहाँ वर्षा-ऋतु का मनोहर वातावरण साकार हो उठा हो। श्री हठी कहते हैं कि मैं उस अद्भुत झाँकी पर बलिहारी जाता हूँ, जहाँ श्री राधिका प्यारी हौज (जलाशय) के समीप अत्यन्त आनन्द और विनोद के साथ बैठकर उस रमणीय दृश्य का अवलोकन कर रही हैं। [2]

