हरि कौ सुमिरौ हर घरी - श्री रसनिधि

हरि कौ सुमिरौ हर घरी - श्री रसनिधि

हरि कौ सुमिरौ हर घरी, हरि हरि ठौर जुबान।
हरि विधि हरि केह्वै रहो, रसनिधि सत सुजान॥

- श्री रसनिधि

हे परम चतुर और सज्जन पुरुषों! जीवन की प्रत्येक घड़ी में श्री हरि का ही स्मरण करो और अपनी जिह्वा से सदैव 'हरि हरि' बोलो। प्रत्येक प्रकार से श्री हरि के ही बनकर रखो। इसी में ही जीवन की परम सार्थकता है।