नीके द्रुम फूले-फूल सुभग - श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (29)

नीके द्रुम फूले-फूल सुभग - श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (29)

(राग मलार)
नीके द्रुम फूले-फूल, सुभग कालिन्दी कूल,
इन्द्र-धनुष राजैं, स्याम घटनि में। [1]
नीके गृह लता कुंज, नीकी आली अलि-गुंज,
नीकौ राग-रंग रह्यौ, पिकनि की रटनि में॥ [2]
नीकी गति मंद-मंद, बिहारी आनन्द-कन्द,
नीको भेद बन्यौ, अरुन पीत पटनि में। [3]
श्रीबीठलविपुल रंग, ललिता के फूले अंग,
मिलते देखौंगी नैंन, नीकी विधि छटनि में॥ [4]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (29)

परम पावन श्री यमुनाजी के पुलिन पर समस्त तरु-लताओं में अलौकिक पुष्प विकसित हो रहे हैं। आकाश में सघन श्याम-घटाओं के मध्य सतरंगी इंद्रधनुष की अनुपम छटा सुशोभित हो रही है। [1]

दिव्य निकुंज-भवन के सघन कुंजों में भ्रमरों की पंक्तियाँ मधुर गुंजन कर रही हैं, और कोकिल-वृन्द की कूक से संगीतमय माधुरी का विस्तार हो रहा है। [2]

इस अलौकिक रसमय वातावरण में प्राण-वल्लभ श्रीबिहारी-बिहारिणीजू मंद-मंद गति से सुकोमल पग रखते हुए आनन्द राशि का वर्धन कर रहे हैं। श्रीयुगल के इस रसमय मिलन में स्वामिनी जू के श्रीअंग पर सुशोभित अरुण साड़ी और प्रियतम के पीताम्बर के परस्पर संसर्ग से एक परम विचित्र रस-रहस्य का प्राकट्य हो रहा है। [3]

प्रिया-लाल के इस विपुल विलास का दर्शन करके प्रधान सहचरी श्रीललिताजी का अंग-प्रत्यंग अहोभाव से प्रफुल्लित हो रहा है। वे अपने हृदय की यह उत्कृष्ट अभिलाषा अभिव्यक्त कर रही हैं कि हे रस के विधाता! मुझे इस प्राणोन्मादक छवि-छटा के नित्य-निरंतर दर्शनों का महा-सौभाग्य प्राप्त होता रहे। [4]