ध्याने ध्यानेन राधाया व्यायन्ते ध्यानतत्पराः।
इहैव जीवन्मुक्तास्ते परत्र कृष्णपार्षदाः॥
- ब्रह्मवैवर्तपुराण - 4.124.97 (खण्डः 4 [श्रीकृष्णजन्मखण्डः]/अध्यायः 124 / छंद 97)
जो साधक निरन्तर श्रीराधा के ध्यान में तल्लीन रहते हैं और अपने मन को उन्हीं के ध्यान में लगाते हैं, वे इसी जीवन में जीवन्मुक्त हो जाते हैं। शरीर त्यागने के पश्चात् वे श्रीकृष्ण के पार्षद (नित्य दिव्य सेवक) बनते हैं।
इहैव जीवन्मुक्तास्ते परत्र कृष्णपार्षदाः॥
- ब्रह्मवैवर्तपुराण - 4.124.97 (खण्डः 4 [श्रीकृष्णजन्मखण्डः]/अध्यायः 124 / छंद 97)
जो साधक निरन्तर श्रीराधा के ध्यान में तल्लीन रहते हैं और अपने मन को उन्हीं के ध्यान में लगाते हैं, वे इसी जीवन में जीवन्मुक्त हो जाते हैं। शरीर त्यागने के पश्चात् वे श्रीकृष्ण के पार्षद (नित्य दिव्य सेवक) बनते हैं।

![ध्याने ध्यानेन राधाया व्यायन्ते - ब्रह्मवैवर्तपुराण - 4.124.97 (खण्डः 4 [श्रीकृष्णजन्मखण्डः]/अध्यायः 124 / छंद 97)](https://images.brajrasik.org/6a53426332d60900043a9543-m.jpeg)