रसना! श्रीराधाबल्लभ कहि री।
श्रुति-स्मृति पुरान न गानौं, इहिं रस नीकै गहि री॥ [1]
संतत सार सन्तनि यह गायौ, शिव-विधि सुर-मुनि चहि री।
जैश्रीकमलनैंन हित जमल कल-सागर, यामें आनँद लहि री॥ [2]
- श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (205)
हे रसना! निरन्तर "श्रीराधाबल्लभ" नाम का ही उच्चारण कर। श्रुति, स्मृति और पुराणों के विविध विषयों में अधिक न उलझकर, इस नाम-रस को दृढ़तापूर्वक ग्रहण कर। [1]
संत महापुरुषों ने सदा इसी नाम-महिमा का गान किया है। शिव, ब्रह्मा तथा देवता और मुनिगण भी इसी रस की अभिलाषा रखते हैं। श्री हित कमलनैन जी कहते हैं कि यह हितमई युगल जोड़ी साक्षात् सुंदरता की सागर है, अत: इनमें अवगाहन करके रसानंद प्राप्त करो। [2]
श्रुति-स्मृति पुरान न गानौं, इहिं रस नीकै गहि री॥ [1]
संतत सार सन्तनि यह गायौ, शिव-विधि सुर-मुनि चहि री।
जैश्रीकमलनैंन हित जमल कल-सागर, यामें आनँद लहि री॥ [2]
- श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (205)
हे रसना! निरन्तर "श्रीराधाबल्लभ" नाम का ही उच्चारण कर। श्रुति, स्मृति और पुराणों के विविध विषयों में अधिक न उलझकर, इस नाम-रस को दृढ़तापूर्वक ग्रहण कर। [1]
संत महापुरुषों ने सदा इसी नाम-महिमा का गान किया है। शिव, ब्रह्मा तथा देवता और मुनिगण भी इसी रस की अभिलाषा रखते हैं। श्री हित कमलनैन जी कहते हैं कि यह हितमई युगल जोड़ी साक्षात् सुंदरता की सागर है, अत: इनमें अवगाहन करके रसानंद प्राप्त करो। [2]

