जायौ भौंड़ी भेड़ कौ कीनौं - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (576)

जायौ भौंड़ी भेड़ कौ कीनौं - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (576)

जायौ भौंड़ी भेड़ कौ, कीनौं चाहै ऐंड़।
ऐंड़ तौ रसिकन सौं बनैं, जिन तोरी सब मेंड़॥

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (576)

यदि कोई भेड़ का बच्चा (भोली भेड़) सिंह बनना चाहे, तो केवल इच्छा करने से वह सिंह नहीं बन सकता। सिंह तो वही बन सकता है जिसने अपने चारों ओर की सभी बाड़ें (बंधन और सीमाएँ) तोड़ दी हों। जो अनेक धर्मों-कर्मों, विधि-निषेधों, सांप्रदायिक विकृतियों अथवा बन्धनों में फँसा हुआ हो, वह सिंह के समान दृढ़ व्रत रखने वाले अनन्य रसिकों की भला क्या समानता करेगा। वास्तविक रसिक तो वही होता है जिसने समस्त बन्धनों को तोड़कर केवल एकमात्र प्रिया-प्रियतम से ही अनन्य सम्बन्ध जोड़ लिया हो।