साँवरे देखे बिन परत न - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, श्री लालजी की उत्थापन लीला (13)

साँवरे देखे बिन परत न - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, श्री लालजी की उत्थापन लीला (13)

(राग खम्माच का जिला)
साँवरे देखे बिन परत न चैन।
छिन छिन मन अकुलात सखी री, रूप के प्यासे नैन॥ [1]
वह शोभा वह मन्द हँसन वर, वह तिरछी दृग सैन।
नारायण करि गयो बावरी, मधुर सुनाय के बैन॥ [2]

- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, श्री लालजी की उत्थापन लीला (13)

हे सखी! साँवरे (श्रीकृष्ण) के दर्शन किए बिना मुझे तनिक भी चैन नहीं पड़ता। प्रत्येक क्षण मेरा मन व्याकुल रहता है, क्योंकि मेरे नेत्र उनके अनुपम रूप के दर्शन के लिए निरन्तर प्यासे हैं। [1]

उनकी वह अद्भुत शोभा, वह मन्द-मन्द मधुर मुस्कान, वह तिरछी चितवन और उनके मधुर संकेत—इन सबने मुझे पूर्णतः प्रेमविह्वल बना दिया है। श्री नारायण स्वामी कहते हैं कि श्रीकृष्ण की मधुर वाणी सुनकर मैं बावरी हो गई हूँ। [2]