झूठ मसकरी मन लगै हरि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (114)

झूठ मसकरी मन लगै हरि - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (114)

झूठ मसकरी मन लगै, हरि भजिवे कौं झेर।
‘व्यासदास’ की पौरि तें, भक्ति भजी दै टेर॥

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, साखी (114)

सांसारिक जीव का मन व्यर्थ की बातों और हँसी-मज़ाक में तो सहज ही लग जाता है, किन्तु श्रीहरि के भजन के समय वह टालमटोल करने लगता है। श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि ऐसे जीव की भजन-विमुखता देखकर भक्ति स्वयं पुकारती हुई उनकी देहली से ही लौट जाती है।