जय जय श्री बरसानों रससान्यौ - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (12)

जय जय श्री बरसानों रससान्यौ - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (12)

जय जय श्री बरसानों रससान्यौ।
श्री वृषभान गोप गृह अद्भुत,
कीरत जस वितान तान्यौ॥ [1]
क्रीडत लली अलिगन सेवत,
अविचल लाल मधुप मडरान्यौं।
जयश्री बंसी अलि की सोंह खात हो,
लेहों एक मुख ग्रास अमान्यौं॥ [2]

- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (12)

श्री बरसाना धाम की जय हो, जो रस का अथाह भण्डार है। श्री वृषभानु गोप का यह अद्भुत गृह समस्त दिशाओं में श्री कीर्तिदा जी के यश और महिमा का विस्तार कर रहा है। [1]

यहाँ श्री राधा अपनी सखियों के साथ आनन्दपूर्वक क्रीड़ा करती हैं, तथा जहाँ भँवरे के समान श्री कृष्ण नित्य ही उनका रसपान करने के लिए मंडराते हैं। श्री वंशी अलि इस कथन की सत्यता को अत्यन्त दृढ़ता से व्यक्त करते हुए शपथपूर्वक इसकी पुष्टि करते हैं। [2]