हित मूरति हित प्रेम निधि, हित की जीवनि मूरि।
राधा-राधा हित भरी, रोम-रोम हित पूरि॥
- श्री हित परमानंद दास जी, श्रीराधा रस सहस्रनाम
श्री राधा साक्षात् प्रेम की मूर्ति हैं, वे प्रेम की निधि हैं, तथा प्रेम का मूल आधार हैं। श्रीराधा सर्वथा केवल प्रेम से ही भरी हुई हैं, उनका रोम-रोम प्रेम-रस से परिपूर्ण है।
राधा-राधा हित भरी, रोम-रोम हित पूरि॥
- श्री हित परमानंद दास जी, श्रीराधा रस सहस्रनाम
श्री राधा साक्षात् प्रेम की मूर्ति हैं, वे प्रेम की निधि हैं, तथा प्रेम का मूल आधार हैं। श्रीराधा सर्वथा केवल प्रेम से ही भरी हुई हैं, उनका रोम-रोम प्रेम-रस से परिपूर्ण है।

