(कवित्त)
नेति नेति कहि ताहि वेदहू बखान करें,
ब्रह्मा आदि सुर मुनी निसदिन ध्यायो है। [1]
शेषहू रटत जाको पावत न ओर छोर,
ताहि को यशोदा मैया गोद में खिलायो है॥ [2]
शिव सनकादि ताहि खोज खोज हारि रहे,
ब्रजवाला प्रेम बस रासहू रचायो है। [3]
कहै चरणदास शुकदेव के प्रताप सेती,
आदि पुरुष भक्ति हेत नन्द गेह आयो है॥ [4]
- श्री चरणदास, भक्ति सागर
वेद भी जिनका 'नेति-नेति' कहकर वर्णन करते हैं और ब्रह्मा आदि समस्त देवता तथा मुनिजन रात-दिन जिनका निरंतर ध्यान धरते हैं। [1]
हजार मुखों वाले शेषनाग भी जिनका नाम निरंतर रटते हुए जिनके स्वरूप का आदि-अंत नहीं पा पाते हैं, उन्हीं अविनाशी प्रभु को माता यशोदा अपनी गोद में खिला रही हैं। [2]
भगवान शिव और सनकादि मुनि जिन्हें सर्वत्र खोज-खोजकर भी पाने में असमर्थ रहे, उन्हीं परमेश्वर ने ब्रज की गोपियों के प्रेम के वशीभूत होकर उनके साथ रास रचाया है। [3]
चरणदास जी कहते हैं कि अपने गुरु श्री शुकदेव जी के प्रताप और कृपा से यह रहस्य जाना है कि वे आदि पुरुष भगवान केवल अपने भक्तों की भक्ति के कारण ही नंद बाबा के घर पधारे हैं। [4]
नेति नेति कहि ताहि वेदहू बखान करें,
ब्रह्मा आदि सुर मुनी निसदिन ध्यायो है। [1]
शेषहू रटत जाको पावत न ओर छोर,
ताहि को यशोदा मैया गोद में खिलायो है॥ [2]
शिव सनकादि ताहि खोज खोज हारि रहे,
ब्रजवाला प्रेम बस रासहू रचायो है। [3]
कहै चरणदास शुकदेव के प्रताप सेती,
आदि पुरुष भक्ति हेत नन्द गेह आयो है॥ [4]
- श्री चरणदास, भक्ति सागर
वेद भी जिनका 'नेति-नेति' कहकर वर्णन करते हैं और ब्रह्मा आदि समस्त देवता तथा मुनिजन रात-दिन जिनका निरंतर ध्यान धरते हैं। [1]
हजार मुखों वाले शेषनाग भी जिनका नाम निरंतर रटते हुए जिनके स्वरूप का आदि-अंत नहीं पा पाते हैं, उन्हीं अविनाशी प्रभु को माता यशोदा अपनी गोद में खिला रही हैं। [2]
भगवान शिव और सनकादि मुनि जिन्हें सर्वत्र खोज-खोजकर भी पाने में असमर्थ रहे, उन्हीं परमेश्वर ने ब्रज की गोपियों के प्रेम के वशीभूत होकर उनके साथ रास रचाया है। [3]
चरणदास जी कहते हैं कि अपने गुरु श्री शुकदेव जी के प्रताप और कृपा से यह रहस्य जाना है कि वे आदि पुरुष भगवान केवल अपने भक्तों की भक्ति के कारण ही नंद बाबा के घर पधारे हैं। [4]

