ऐसी कृपा करो श्रीराधे, मिले श्री वृन्दावन में वास।
राखहु नित निज कुञ्ज भवन में, सेवा देकर खास॥ [1]
तेरी प्रीति की चाह हृदय हो, और न दूजी आश।
करूँ तेरा सुख चिन्तन तेरे, सुख वश सकल प्रयास॥ [2]
दासी मैं तुम स्वामिनी मेरी, पुरबहु सब अभिलाष।
सब जग जन पहचानि कहें मोहे, 'राधाचरण' का दास॥ [3]
- श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली
हे श्री राधे! मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए कि मुझे श्री वृन्दावन में अखण्ड वास प्राप्त हो। मुझे अपने निज कुञ्ज-भवन में स्थान देकर अपनी निज सेवा प्रदान कीजिए।[1]
मेरे हृदय में केवल आपकी अनन्य प्रीति की ही लालसा रहे और उसके अतिरिक्त कोई दूसरी अभिलाषा न हो। मैं सदा आपके सुख में ही सुखी रहूँ अथवा आपको कैसे सुख मिले उसका ही चिन्तन करता रहूँ तथा मेरे समस्त प्रयत्न केवल आपके सुख की पूर्ति के लिए हों। [2]
मैं आपकी दासी हूँ और आप मेरी स्वामिनी हैं; कृपापूर्वक मेरी समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण कीजिए। श्री राधा चरण दास कहते हैं कि अब समस्त संसार मुझे आपके चरणों का दास कहता है और वही मेरी वास्तविक पहचान है। [3]
राखहु नित निज कुञ्ज भवन में, सेवा देकर खास॥ [1]
तेरी प्रीति की चाह हृदय हो, और न दूजी आश।
करूँ तेरा सुख चिन्तन तेरे, सुख वश सकल प्रयास॥ [2]
दासी मैं तुम स्वामिनी मेरी, पुरबहु सब अभिलाष।
सब जग जन पहचानि कहें मोहे, 'राधाचरण' का दास॥ [3]
- श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली
हे श्री राधे! मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए कि मुझे श्री वृन्दावन में अखण्ड वास प्राप्त हो। मुझे अपने निज कुञ्ज-भवन में स्थान देकर अपनी निज सेवा प्रदान कीजिए।[1]
मेरे हृदय में केवल आपकी अनन्य प्रीति की ही लालसा रहे और उसके अतिरिक्त कोई दूसरी अभिलाषा न हो। मैं सदा आपके सुख में ही सुखी रहूँ अथवा आपको कैसे सुख मिले उसका ही चिन्तन करता रहूँ तथा मेरे समस्त प्रयत्न केवल आपके सुख की पूर्ति के लिए हों। [2]
मैं आपकी दासी हूँ और आप मेरी स्वामिनी हैं; कृपापूर्वक मेरी समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण कीजिए। श्री राधा चरण दास कहते हैं कि अब समस्त संसार मुझे आपके चरणों का दास कहता है और वही मेरी वास्तविक पहचान है। [3]

