अतन होय वन पायबौ, गायौ मतनु अनेक।
पै रज ही में पतन करि, यह रसिकनि की टेक॥
- श्री किशोरी अलि (रत्न अलि को पत्र-व्यवहार)
अनेक महापुरुषों का यह मत है कि व्रज में किसी वृक्ष, लता, तृण अथवा अन्य रूप में जन्म प्राप्त होना अथवा वास करना यह तो महान सौभाग्य की बात है ही, तथापि, रसिकों की दृढ़ मान्यता यह भी है कि उनकी इस भौतिक देह का विसर्जन भी इसी चिन्मय व्रज-रज के अंक में ही संपन्न होना चाहिए।
पै रज ही में पतन करि, यह रसिकनि की टेक॥
- श्री किशोरी अलि (रत्न अलि को पत्र-व्यवहार)
अनेक महापुरुषों का यह मत है कि व्रज में किसी वृक्ष, लता, तृण अथवा अन्य रूप में जन्म प्राप्त होना अथवा वास करना यह तो महान सौभाग्य की बात है ही, तथापि, रसिकों की दृढ़ मान्यता यह भी है कि उनकी इस भौतिक देह का विसर्जन भी इसी चिन्मय व्रज-रज के अंक में ही संपन्न होना चाहिए।

