गावैं सुनि गनिका गन्धर्ब औ - श्री रसखान रत्नावली

गावैं सुनि गनिका गन्धर्ब औ - श्री रसखान रत्नावली

(सवैया)
गावैं सुनि गनिका गन्धर्ब,
औ सारद सेष सबै गुन गावत। [1]
नाम अनंत गनंत गनेस,
ज्यौं ब्रह्मा त्रिलोचन पार न पावत॥ [2]
जोगी जती तपसी अरु सिद्ध,
निरन्तर जाहि समाधि लगावत। [3]
ताहि अहीर की छोहरियाँ,
छछिया भरि छाछ पै नाच नचावत॥ [4]

- श्री रसखान, रसखान रत्नावली

जिन भगवान के गुणों का गान गन्धर्व, सरस्वती और शेषजी निरन्तर करते हैं, जिनकी महिमा का यथार्थ वर्णन कोई नहीं कर सकता। [1]

जिनके अनन्त नामों की गणना स्वयं गणेश भी नहीं कर सकते, और जिनकी महिमा का पार ब्रह्मा तथा त्रिलोचन (भगवान शिव) भी नहीं पा सकते। [2]

जिनमें योगी, यति, तपस्वी और सिद्धजन निरन्तर अपने मन को लीन करने का प्रयास करते रहते हैं। [3]

उन्हीं सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण को ब्रज की अहीर गोपिकाएं प्रेमपूर्वक छाछ से भरी छोटी-सी छछिया के बदले नाच नचा रही हैं। [4]