राधेराधे नामकी, जकलागै ये वीर।
वृन्दावनवेलिन तरे, जैसें सीख्यो कीर॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (118)
हे भाई! मेरे हृदय में निरंतर केवल 'राधे-राधे' नाम की ही लगन लगी रहे, और मैं श्रीधाम वृन्दावन की लताओं की शीतल छाया में बैठकर इस परम पावन नाम को उसी प्रकार रटता रहूँ, जैसे कोई तोता एक ही नाम निरंतर रटता है।
वृन्दावनवेलिन तरे, जैसें सीख्यो कीर॥
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (118)
हे भाई! मेरे हृदय में निरंतर केवल 'राधे-राधे' नाम की ही लगन लगी रहे, और मैं श्रीधाम वृन्दावन की लताओं की शीतल छाया में बैठकर इस परम पावन नाम को उसी प्रकार रटता रहूँ, जैसे कोई तोता एक ही नाम निरंतर रटता है।

