(राग पीलू – ताल कहरवा)
पापिन को सँग छाँड़ि जतन कर।
जिनके बचन बान सम लागत,
सहज मिलन दरसन परसन डर॥ [1]
सुखको लेस कहाँ परमारथ,
बिषय-लीन नित रहत अधम नर।
‘जुगलप्रिया’ जिनि बिमुख मिलै अब,
रहूँ नर्क में चहै कल्प भर॥ [2]
- श्री युगल प्रिया
साधक को भगवान से विमुख (अधर्मी) जीवों का संग छोड़ने का हर संभव प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि उनके द्वारा कहे गए शब्द तीखे बाणों के समान हृदय को छलनी कर देते हैं। उनके साथ अनजाने में होने वाले मिलन, दर्शन अथवा स्पर्श से भी सर्वथा भयभीत रहना चाहिए, क्योंकि ऐसा असत्-संग भगवद-प्राप्ति के मार्ग में निश्चित ही एक बहुत बड़ा अवरोध बन जाता है। [1]
जो अधम मनुष्य सदैव संसार के तुच्छ भोग-विलास और इंद्रिय-विषयों में ही डूबे रहते हैं, उनके जीवन में न तो वास्तविक सुख का कोई लेश (अंश) होता है और न ही उनके भीतर कभी परमार्थ (कल्याण) का विचार उदित होता है। श्री युगलप्रिया जी दृढ़तापूर्वक कहती हैं कि मुझे जीवन में कभी भी ऐसे भगवद्-विमुख जीवों का कुसंग प्राप्त न हो, चाहे इस संग से बचने के बदले मुझे अनंत युगों (कल्पों) तक घोर नरक की यातना ही क्यों न भुगतनी पड़े। [2]
पापिन को सँग छाँड़ि जतन कर।
जिनके बचन बान सम लागत,
सहज मिलन दरसन परसन डर॥ [1]
सुखको लेस कहाँ परमारथ,
बिषय-लीन नित रहत अधम नर।
‘जुगलप्रिया’ जिनि बिमुख मिलै अब,
रहूँ नर्क में चहै कल्प भर॥ [2]
- श्री युगल प्रिया
साधक को भगवान से विमुख (अधर्मी) जीवों का संग छोड़ने का हर संभव प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि उनके द्वारा कहे गए शब्द तीखे बाणों के समान हृदय को छलनी कर देते हैं। उनके साथ अनजाने में होने वाले मिलन, दर्शन अथवा स्पर्श से भी सर्वथा भयभीत रहना चाहिए, क्योंकि ऐसा असत्-संग भगवद-प्राप्ति के मार्ग में निश्चित ही एक बहुत बड़ा अवरोध बन जाता है। [1]
जो अधम मनुष्य सदैव संसार के तुच्छ भोग-विलास और इंद्रिय-विषयों में ही डूबे रहते हैं, उनके जीवन में न तो वास्तविक सुख का कोई लेश (अंश) होता है और न ही उनके भीतर कभी परमार्थ (कल्याण) का विचार उदित होता है। श्री युगलप्रिया जी दृढ़तापूर्वक कहती हैं कि मुझे जीवन में कभी भी ऐसे भगवद्-विमुख जीवों का कुसंग प्राप्त न हो, चाहे इस संग से बचने के बदले मुझे अनंत युगों (कल्पों) तक घोर नरक की यातना ही क्यों न भुगतनी पड़े। [2]

