(सवैया)
मदिरा रस रूप की पीते हुये,
यह लोचन दोनों थके रहते हैं। [1]
सुनते सुनते मुरली ध्वनि को,
हरेकृष्ण! जके से वके रहते हैं॥ [2]
परवाह करें किस की अब तो,
दिन रात उसी को तके रहते हैं। [3]
उस विस्व विमोहन मोहन कौ,
हम तो छवि छाक छके रहते हैं॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’
प्रियतम श्रीकृष्ण के सौंदर्य-रस रूपी मदिरा का निरंतर पान करते रहने के कारण मेरे ये दोनों नेत्र सदा प्रेम के उन्माद में मग्न और थके से रहते हैं। [1]
हे हरेकृष्ण! उनकी वंशी की अत्यंत मधुर ध्वनि को निरंतर सुनते रहने के कारण हम पूरी तरह अपनी सुध-बुध खोकर चकित और स्तब्ध से बने रहते हैं। [2]
अब हमें इस संसार में किसी की कोई चिंता या परवाह नहीं रह गई है, क्योंकि हम तो दिन-रात केवल उन्हीं की ओर एकटक टकटकी लगाए निहारते रहते हैं। [3]
संपूर्ण विश्व को मोहित करने वाले उन मनमोहन श्रीकृष्ण की अनुपम रूप-माधुरी के आनंद और मादकता से हम सदा पूरी तरह सराबोर रहते हैं। [4]
मदिरा रस रूप की पीते हुये,
यह लोचन दोनों थके रहते हैं। [1]
सुनते सुनते मुरली ध्वनि को,
हरेकृष्ण! जके से वके रहते हैं॥ [2]
परवाह करें किस की अब तो,
दिन रात उसी को तके रहते हैं। [3]
उस विस्व विमोहन मोहन कौ,
हम तो छवि छाक छके रहते हैं॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’
प्रियतम श्रीकृष्ण के सौंदर्य-रस रूपी मदिरा का निरंतर पान करते रहने के कारण मेरे ये दोनों नेत्र सदा प्रेम के उन्माद में मग्न और थके से रहते हैं। [1]
हे हरेकृष्ण! उनकी वंशी की अत्यंत मधुर ध्वनि को निरंतर सुनते रहने के कारण हम पूरी तरह अपनी सुध-बुध खोकर चकित और स्तब्ध से बने रहते हैं। [2]
अब हमें इस संसार में किसी की कोई चिंता या परवाह नहीं रह गई है, क्योंकि हम तो दिन-रात केवल उन्हीं की ओर एकटक टकटकी लगाए निहारते रहते हैं। [3]
संपूर्ण विश्व को मोहित करने वाले उन मनमोहन श्रीकृष्ण की अनुपम रूप-माधुरी के आनंद और मादकता से हम सदा पूरी तरह सराबोर रहते हैं। [4]

