रस में रस पियें कुंजबिहारी।
रस की बात घात पुनि रस की,
रस ही सों रस दृष्टि निहारी॥ [1]
रस की प्रीति रीति सब रस की,
रस ही उमगत सहज हियारी।
रसकी सखी रसिक हरिदासी,
रस भयो ललित प्रिये उरहारी॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (101)
श्रीकुञ्जबिहारी स्वयं दिव्य प्रेम-रस में निमग्न होकर उसी रस का आस्वादन करते हैं। उनकी प्रत्येक वार्ता, प्रत्येक चेष्टा और प्रत्येक दृष्टि प्रेम-रस से ही परिपूर्ण है। वे रसस्वरूप होकर प्रेममयी दृष्टि से अपनी प्रिया का अवलोकन करते हैं। [1]
उनका प्रेम, उनकी रीति और उनका सम्पूर्ण व्यवहार केवल रसमय है। उनके हृदय से स्वाभाविक रूप से प्रेम-रस उमड़ता रहता है। उनकी सखियाँ भी रसमयी हैं और रसिक हरिदासीजी भी उसी रस में निमग्न हैं। ऐसी ललिता जी की यह प्राणप्रिय जोड़ी, श्यामा कुंजबिहारी, एक दूसरे के हृदय का हार बनकर साक्षात् रस-रूप ही हो गए हैं। [2]
रस की बात घात पुनि रस की,
रस ही सों रस दृष्टि निहारी॥ [1]
रस की प्रीति रीति सब रस की,
रस ही उमगत सहज हियारी।
रसकी सखी रसिक हरिदासी,
रस भयो ललित प्रिये उरहारी॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (101)
श्रीकुञ्जबिहारी स्वयं दिव्य प्रेम-रस में निमग्न होकर उसी रस का आस्वादन करते हैं। उनकी प्रत्येक वार्ता, प्रत्येक चेष्टा और प्रत्येक दृष्टि प्रेम-रस से ही परिपूर्ण है। वे रसस्वरूप होकर प्रेममयी दृष्टि से अपनी प्रिया का अवलोकन करते हैं। [1]
उनका प्रेम, उनकी रीति और उनका सम्पूर्ण व्यवहार केवल रसमय है। उनके हृदय से स्वाभाविक रूप से प्रेम-रस उमड़ता रहता है। उनकी सखियाँ भी रसमयी हैं और रसिक हरिदासीजी भी उसी रस में निमग्न हैं। ऐसी ललिता जी की यह प्राणप्रिय जोड़ी, श्यामा कुंजबिहारी, एक दूसरे के हृदय का हार बनकर साक्षात् रस-रूप ही हो गए हैं। [2]

