जो कोई प्रिया चरण मन राखत।
तिनहिं मुकुंद मूर्ति आनंद घन, श्याम सुन्दर अनुराग देत अत॥ [1]
क्षण-क्षण चमत्कार कानन में, देत सदा नहिं नेक विसारत।
सो रसनिधि राधा पद अंबुज, मुदित होहुँ कब नैन निहारत॥ [2]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (103)
जो कोई अपने मन को श्रीप्रियाजी (श्रीराधा) के चरणों में सदा लगाए रखता है, आनन्दस्वरूप श्रीश्यामसुन्दर उस पर अपार प्रेम की वर्षा करते हैं। [1]
जिन चरणारविन्दों की महिमा श्रीवृन्दावन में क्षण-क्षण चमत्कृत होती रहती है, जिनकी छवि पूर्ण रूप से प्रकाशित रहती है और जो हर क्षण रस का प्रवाह करते हैं—ऐसे रस-निधि श्रीराधा महारानी जू के चरणों का मैं कब प्रफुल्लित होकर अवलोकन करूँगा? [2]
तिनहिं मुकुंद मूर्ति आनंद घन, श्याम सुन्दर अनुराग देत अत॥ [1]
क्षण-क्षण चमत्कार कानन में, देत सदा नहिं नेक विसारत।
सो रसनिधि राधा पद अंबुज, मुदित होहुँ कब नैन निहारत॥ [2]
- श्री हित किशोरी लाल, राधा सुधा निधि स्तव (103)
जो कोई अपने मन को श्रीप्रियाजी (श्रीराधा) के चरणों में सदा लगाए रखता है, आनन्दस्वरूप श्रीश्यामसुन्दर उस पर अपार प्रेम की वर्षा करते हैं। [1]
जिन चरणारविन्दों की महिमा श्रीवृन्दावन में क्षण-क्षण चमत्कृत होती रहती है, जिनकी छवि पूर्ण रूप से प्रकाशित रहती है और जो हर क्षण रस का प्रवाह करते हैं—ऐसे रस-निधि श्रीराधा महारानी जू के चरणों का मैं कब प्रफुल्लित होकर अवलोकन करूँगा? [2]

