बदन झलक अंग-अंग ललक अधरनि - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (42)

बदन झलक अंग-अंग ललक अधरनि - श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (42)

बदन झलक अंग-अंग ललक, अधरनि की मुसिकानि।
करत बिहार अहार नित्य, स्यामा-स्याम सुजानि॥

- श्री रूप सखी, श्रृंगार रस के दोहे (42)

श्री श्यामा-श्याम के श्रीमुख की दिव्य झलक, प्रत्येक अंग की परस्पर मिलन की लालसा और उनके अधरों की मन्द मुसकान अत्यंत मनमोहक है। ये परम चतुर युगल सरकार (श्यामा-श्याम सुजान) नित्य-विहार के प्रेमामृत रस को ही अपना निरंतर आहार बनाकर प्रतिक्षण श्री धाम वृंदावन में क्रीड़ा करते हैं।